डॉ. आशीष जैन आचार्य निबंध प्रतियोगिता में प्रथम
अजमेर संगोष्ठी रिपोर्ट
अजमेर।। परम आचार्यश्री वसुनंदीजी महाराज के परम सान्निध्य में आगमनिष्ठ राष्ट्रीय विद्वत्संगोष्ठी का आयोजन दिनांक 12 अप्रैल से 14 अप्रैल 2025 तक श्री जिनशासन तीर्थ नाका मदार, अजमेर में किया गया। संगोष्ठी का मुख्य विषय आचार्यश्री वसुनंदीजी महाराज द्वारा विरचित प्राकृत साहित्य और उसका वैशिष्ट्य रहा। संगोष्ठी का आयोजन श्रीजिनशासनतीर्थ नाका मदार, अजमेर एवं प्राकृत भाषा विकास फाउण्डेशन तथा एकलव्य विवि दमोह के तत्वावधान में किया गया। भारत वर्ष से 36 से अधिक विद्वानों की उपिस्थति रही। संगोष्ठी के कुलपति डॉ. शीतलचन्द्र जैन जयपुर एवं निदेशक डॉ. श्रेयांस कुमार जैन बडौत तथा संगोष्ठी के संयोजक पं.श्री मनोज जैन शास्त्री अहार एवं सह-संयोजक डॉ.आशीष जैन शास्त्री बम्हौरी रहे। विद्वानों आचार्य वसुनन्दी मुनि कृत 'णंदिणंद सुत्तं' का वैशिष्ट्य - डॉ. शीतलचन्द्र जैन, जयपुर, आचार्य वसुनन्दी मुनि कृत 'रट्ठ - संति - महाजण्णो' में राजनैतिक व्यवस्था - डॉ. शैलेश जैन बांसवाड़ा, आचार्य वसुनन्दी मुनि कृत 'पुण्णासव - णिलयो' का विषय विवेचन प्राचार्य विनीत जैन, ललितपुर, सम्यक् ज्ञान की सिद्धि 'वयण - पमाणत्तं' के सन्दर्भ में डॉ श्रेयांस कुमार जैन, बड़ौत, आचार्य वसुनन्दी जी महाराज कृत 'खवगराय - सिरोमणी' की समीक्षा डॉ. नरेन्द्र जैन, टीकमगढ़, 'आचार्यश्री वसुनंदी जी महाराज का शिक्षादर्शन डॉ आशीष जैन, आचार्य शाहगढ़, 'जदि-किदि-कम्मं' कृति के परिप्रेक्ष्य में कृतिकर्म एवं उसके भेद डॉ. पंकज कुमार जैन, इन्दौर, आचार्य वसुनन्दी जी महाराज कृत 'कला - विण्णाणं' में वर्णित पुरुषों की 72 कलाएं डॉ. बाहुवलि जैन, रजवांस, आचार्य वसुनन्दी जी महाराज कृत 'धम्म - सुतं' का विषय विवेचन डॉ. जयकुमार जैन, मुजफ्फरनगर , आचार्य वसुनन्दी महाराज के प्राकृत साहित्य परिचय प्रतिष्ठाचार्य मनोज जैन शास्त्री आहार जी , आचार्य वसुनन्दी महाराज कृत 'अप्प - विहवो' का समसामयिक चिन्तन डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन, 'भारती', आचार्य वसुनन्दी मुनि कृत 'तच्च - सारो' में सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था डॉ. जयकुमार उपाध्ये, 'तच्च - सारो' में तत्त्व एवं द्रव्य विचार पं. राजकुमार जैन, शास्त्री सागर, 'विज्जावसु-सावयायारो' में सम्यक्दर्शनादि का स्वरूप डॉ. अनिल जैन, जयपुर, आचार्य श्री वसुनन्दी कृत 'णमोयार महप्पुरो' की समीक्षा डॉ. सुनील जैन 'संचय' ललितपुर , 'अणुवेक्खा - सारो' ग्रन्थ का वैशिष्ट्य डॉ. ज्योतिबाबू जैन, उदयपुर, 'अणुवेक्खा - सारो' में लोकानुप्रेक्षा का स्वरूप डॉ. पुलक जैन गोयल ,'मंगलसुत्तं' में मंगल एवं उसके भेद पं. अखलेश जैन, टीकमगढ, आचार्य वसुनन्दी कृत अष्टांगयोग का वैशिष्ट्य डॉ. आशीष जैन, शिक्षाचार्य दमोह, आचार्य वसुनन्दी मुनि कृत 'लोगुत्तरवित्ती' का समसामयिक चिंतन पं. सुनील जैन सुधाकर द्रोणगिरि, आचार्य वसुनन्दी कृत 'अहिंसगाहारो' का समसामयिक चिंतन पं. अरुण जैन, जबलपुर, ‘रयणकंडो' में वर्णित सूक्तियों का वैशिष्ट्य डॉ. कोमल जैन, कानपुर, प्राकृत चरित्र काव्य की परम्परा में 'सिरिसीयलणाह - चरियं' का स्थान डॉ. सुमित जैन, उदयपुर, आचार्य श्री वसुनन्दी महाराज कृत 'समवसरण सोहा' कृति में समवशरण की महिमा पं. विजय शास्त्री शाहगढ़, आचार्य वसुनंदी कृत 'झाण- सारो' में वर्णित ध्यान और उसके भेद डॉ. श्रीयांस जैन सिंघई जयपुर , 'अज्झप्प - सुत्ताणि' में आत्म चिंतन का स्वरूप और उनकी विवेचना पं. सुनील जैन हटा, आचार्य वसुनंदी कृत 'अप्पसत्ती' में आत्म शक्ति का विवेचन पं. अंकित शास्त्री मडदेवरा, आचार्य वसुनंदी जी महाराज कृत 'वेरग्य - सारो' ग्रंथ में वैराग्य विषयक चिंतन पं. पवन जैन दीवान सागर , आचार्य श्री वसुनंदी कृत 'विश्व-धर्म ग्रन्थ की समीक्षा पं. वीरेन्द्र जैन, शास्त्री हीरापुर , आचार्य वसुनंदी जी महाराज कृत 'पसम - भावो' का विषय विवेचन पं. अनिल जैन, शास्त्री सागर, आचार्य श्री वसुनंदी महाराज कृत 'तव - सारो' में वर्णित तप विषयक चिंतन डॉ. आशीष कुमार जैन, बम्हौरी आलेख वाचन किए गए। इसके अलावा अभिषेक जैन शास्त्री सागर, डॉ.सुशील जैन कुरावली, पं.श्री पीयूष जैन शास्त्री सागर, पं.श्री आलोक जैन शास्त्री महलरा,पं.श्री धन्यकुमार जैन अजमेर आदि विद्वान् उपिस्थत रहे।
डॉ. आशीष जैन आचार्य निबंध प्रतियोगिता में प्रथम
आचार्यश्री वसुनंदीजी महाराज के आशीर्वाद एवं प्रेरणा से भगवान ऋषभदेव और उनके जीवन दर्शन के विभिन्न विषयों को आधार बनाकर देशभर के विद्वानों के मध्य निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता में डॉ. आशीष जैन आचार्य शाहगढ़ ने भगवान ऋषभदेव स्वामी, उनका निर्वाण स्थल कैलाशपर्वत और कैलाशपर्वत पर जिनमंदिर पर निबंध लिखा गया। डॉ. आशीष जैन आचार्य को पूर्व में प्राकृत भाषा के लिए उत्कृष्ट कार्य करने के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका है। वर्तमान में, वे संस्कृत, प्राकृत जैसी प्राच्य भाषाओं की शिक्षा के उत्थान के लिए भी अनेक कार्य कर रहे हैं। इस प्रतियोगिता का संयोजक पं.श्री मनोज जैन शास्त्री अहार रहे। उनकी इस उपलब्धि पर अ.भा.दि. शास्त्रिपरिषद् एवं प्राकृत भाषा विकास फाउण्डेशन के सभी सदस्यों ने तथा देशभर के विद्वानों द्वारा शुभकामनाएँ प्रेषित की गई।