प्राकृत भाषा विकास फाउंडेशन द्वारा “लोक भाषा प्राकृत और भगवान महावीर के वैज्ञानिक सिद्धांत” विषय पर ऑनलाइन संगोष्ठी का सफल आयोजन
प्राकृत भाषा विकास फाउंडेशन द्वारा “लोक भाषा प्राकृत और भगवान महावीर के वैज्ञानिक सिद्धांत” विषय पर ऑनलाइन संगोष्ठी का सफल आयोजन
प्राकृत भाषा के संरक्षण संवर्धन के लिए समर्पित संस्था प्राकृत भाषा विकास फाउंडेशन द्वारा प्रथम ऑनलाइन संगोष्ठी लोक भाषा प्राकृत और भगवान महावीर के वैज्ञानिक सिद्धांत विषय पर आयोजित की गई।संगोष्ठी का मंगलाचरण डॉ. कोमल जी शास्त्री (प्राध्यापक प्राकृत शोधपीठ कानपुर) ने किया। बीज वक्तव्य एवं संस्था का परिचय डॉ आशीष जैन आचार्य (महामंत्री प्राकृत विकास फाउण्डेशन)ने दिया।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता प्राकृत मर्मज्ञ वरिष्ठ विद्वान डॉ जयकुमार उपाध्येय (प्रोफेसर प्राकृत शोध पीठ, श्रवणबेलगोला) ने भगवान महावीर के गहन विचारों को वर्तमान परिपेक्ष्य में प्रस्तुत किया ओर यह बताया कि कैसे प्राकृत भाषा ज्ञान , विज्ञान, तर्क और दर्शन की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रही है ।
कार्यक्रम में आमत्रित मुख्य वक्ता युवा मनीषी डॉ सोनल जी शास्त्री(संयुक्त महामंत्री अखिल भारतवर्ष दिगंबर जैन शास्त्री परिषद) ने भगवान महावीर के वैज्ञानिक सिद्धांत का विवेचन करते हुए कैसे आज के समय में भगवान महावीर के संदेश विज्ञान की कसौटी पर उतरते है इस बारे में विशेष विषय प्रतिपादित किया ।
संगोष्ठी के अध्यक्षता डॉ ऋषभ जी फौजदार (अध्यक्ष प्राकृत विकास फाउण्डेशन) और सारस्वत अतिथि डॉ ज्योति बाबू जी (प्रभारी अध्यक्ष जैन दर्शन एवं प्राकृत विद्या, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय उदयपुर) ने की ।अंत में डॉ निर्मल जी ने सभी का अभिवादन किया और कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए संगोष्ठी का समापन किया ।संगोष्ठी का सफल संयोजन ओर संचालन डॉ ममता जी पुणे (प्रचार मंत्री प्राकृत भाषा फाउडेशन)ने किया।
इस संगोष्ठी में लगभग 70युवा और वरिष्ठ विद्वानों का सानिध्य मिला जिनमें डॉ श्रेयांश जी बड़ौत (सर्वाध्यक्ष प्राकृत विकास फाउण्डेशन)डॉ शैलेश जैन रामटोरिया डॉ राहुल जी कानपुर डॉ श्री नंदन जी टीकमगढ़ पंडित राजकुमार जी डॉ आशीष जी बम्होरी डॉ शैलेश जैन बांसवांडा पंडित जितेंद्र जी शास्त्री पंडित अरुण जी शास्त्री पंडित राजेश जी शास्त्री पंडित लोकेश जी गनोड़ा आदि का विद्वानों का सानिध्य मिला।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य प्राकृत भाषा के माध्यम से भगवान महावीर के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जनमानस तक पहुंचाना था। प्राकृत भाषा न केवल लोक भाषा रही है, बल्कि इसमें दर्शन, विज्ञान और तात्त्विक ज्ञान का अपार भंडार भी है। जिसका विश्लेषण इस संगोष्ठी में किया गया।
इस आयोजन के माध्यम से प्राकृत भाषा के प्रचार-प्रसार एवं अध्यात्म को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने की दिशा में एक सार्थक पहल की गई।